*हम तो पूँछेंगे कलम की धार- से रोहित*

*हम तो पूँछेंगे कलम की धार- से रोहित*

【1】 *क्या गोपाल दास मंदिर में बेजा कब्जा करने की है तैयारी ,या फिर साधु संत को दहसत में रख डकार रहे धार्मिक राशि*?

【2】 *क्या अधोसरंचना मद में करोड़ो गबन के वाकई दोषी हैं लिपिक या फिर उनके साथ हैं और कई उच्चस्थ अधिकारी*?

*【3】 *क्या अहम के टकराव में विखर रहे संगठन या फिर बेलगाम लोगों के हाँथ में है संगठन की लगाम*?

*मध्य प्रदेश जिला सीधी* :- रविवार कब आ जाता है पता ही नहीं चलता आज रविवार है और हम एक बार पुनः कुछ धारदार सवालों के साथ आप सभी के समक्ष कलम लेकर उपस्थित हैं आज पहला सवाल पहुंच रहे हैं मध्यप्रदेश के सीधी में आदि संत के नाम से विख्यात गोपाल दास मंदिर के संबंध में सवाल पूछने की जरूरत क्यों पड़ी मंदिर-मस्जिद के संबंध में सवाल अक्सर सियासत में हुआ करते हैं लेकिन संक्षिप्त परिचय के साथ बताना चाहते हैं कि गोपाल दास महाराज सिद्ध पुरुषों में से एक थे उनका दर्शन जिन्होंने किया उन्होंने जिसको जो शब्द बोला वह अक्षर सह सत्य निकला वह सिद्ध पुरुष जिसके एक शब्द कहने से पानी घी में तब्दील हो जाता था ऐसे पुरुष द्वारा स्थापित गोपाल दास ट्रस्ट समिति के माध्यम से संचालित गोपाल दास मंदिर आज अपने ही अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है ऐसा इसलिए कि वर्ष 2006 में गोपाल दास मंदिर में परिसर में बने कमरा का किराया वसूलने के लिए संत बहादुर सिंह को 10 प्रतिशत राशि के साथ रखा गया था लेकिन क्षेत्रीय होने के कारण उन्होंने मंदिर में अपना स्वामित्व दर्शाना शुरू कर दिए और किराए की संपूर्ण राशि ट्रस्ट में जमा करने के बजाए हजम करने लगे किराया जमा करने का ट्रस्ट के अध्यक्ष और संतू सिंह संयुक्त खाता था ट्रस्ट के अध्यक्ष विशेश्वर दास के अनुसार कभी भी उन्होंने खाते में राशि नहीं जमा किया एक बार कभी 10000 की राशि जमा किए थे उसके बाद से खाते में राशि जमा करने के बजाए राशि का बारा न्यारा कर गए गोपाल दास मंदिर 30 कमरे हैं उससे किराया भी मिलता है लेकिन किराए का सही जगह उपयोग ना होने के कारण अस्त व्यस्त हो गया है ऐसा इसलिए संभव हो सका की जब कभी प्रभावशाली व्यक्ति के हाथों कोई जिम्मेदारी सौंप दी जाती है और वह उसका गलत उपयोग करने लगे तो वह कभी अपने मूल रास्ते पर नहीं लौट सकता ऐसा ही गोपालदास मंदिर के साथ भी हुआ उपयोग मंदिर परिसर को गांजा और शराब पीने का संस्थान बना दिया गया शराब पीकर आरती पूजा किया जाने लगा पुजारियों से भिक्षा कि राशि छुड़ा ली जाने लगी और पुजारियों को इस दहशत रखा जाने लगा कि अगर मंदिर की बात किसी पत्र या पत्रकार के पास पहुंचाई जाएगी तो आप की जीवन लीला समाप्त कर दी जाएगी इस दहशत में सीधी के पौराणिक मंदिर को अराजकता का गढ़ बना दिया गया कुकृत्यों के कारण शहर के गणमान्य नागरिक गोपाल दास मंदिर में जाना पसंद नहीं करते महिलाएं असुरक्षित महसूस करते हैं कुछ खास त्योहारों को छोड़कर कभी कोई आयोजन नहीं होता मंदिर तो मानो ऐसे बन गया जैसे किसी का स्वयं का मकान हो प्रेमी-प्रेमिकाओं का मिलन होने लगा मंदिर में ही अपराधियों का जमावड़ा लगने लगा सीधी के रसूखदार लोगों को रात्रि 10:00 बजे के बाद गोपाल दास मंदिर में अपने रंग में रंगे देखा जा सकता है एक बार पूर्व में मेरे द्वारा इस मुद्दे को उठाया जा चुका है शिकायत भी की गई लेकिन प्रशासन कार्यवाही नहीं किया अब पुनः बात इसलिए उठी है की गोपालदास चैरिटेबल ट्रस्ट कि 2 लाख 4 4 000 हजार संत बहादुर सिंह के द्वारा हड़प ली गई जिसके बाद ट्रस्ट के अध्यक्ष द्वारा दिनांक 15-7-2017 को एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें संत बहादुर सिंह को हटाए जाने का निर्णय ट्रस्ट के सदस्यों द्वारा लिया गया साथ में यह भी लिखा गया कि उनके द्वारा मंदिर की छवि धूमिल की जा रही है उसके बाद पुनः 18 जनवरी 2018 को दूसरा प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें किराया वसूलने संबंधी अधिकार वापस ले लिया गया और मंदिर की पवित्रता नष्ट करने जैसे गंभीर आरोप ट्रस्टियों द्वारा लगाए गए प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि संत बहादुर सिंह का मंदिर में कोई अधिकार नहीं है इस कारण से मंदिर परिसर में अराजकता फैलाने से उन्हें रोका जाए फिलहाल मामला प्रशासन के पाले में है और आगे की कार्यवाही के लिए सीधी के सामाजिक कार्यकर्ता ,राजनीतिक दल, गैर राजनीतिक दल धार्मिक संस्थान सभी से अपील की जा रही है कि इस गंभीर मामले को आस्था के केंद्र बिंदु से जोड़ते हुए गोपाल दास मंदिर का जीर्णोद्धार कराए जाने का प्रयास किया जाना चाहिए। अब यह लड़ाई गोपाल दास मंदिर के जीर्णोद्धार होने तक जारी रहेगी

【2】 *क्या अधोसंरचना मध्य में करोड़ों गबन के वाकई दोषी हैं लिपिक या फिर उनके साथ हैं और कई उच्च अधिकारी*?

सीधी जिला पंचायत इन दिनों सुर्खियों में है ऐसा इसलिए की नए मुख्य कार्यपालन अधिकारी का प्रशासनिक कार्य करने का तौर तरीका पहले के अधिकारियों से कुछ ठीक है इसलिए पूर्व में हुए अनियमितताओं की जांच कराई जा रही है लेकिन सबसे बड़ी बात जो इस समय सुर्खियों में है वह अधोसंरचना मद में हुए एक करोड़ सत्तर लाख के घोटाले के संबंध में ग्रांड फंड योजना अंतर्गत वर्ष 2017 18 अधोसंरचना विकास की राशि गबन है। जिसमें लिपिकों के ऊपर कार्यवाही सुनिश्चित की जा रही है सभा मीटिंग का दौर जारी है लेकिन यह बात भी अस्पष्ट है की सिर्फ मामले में लिपिक ही दोषी नहीं है निर्वाचित जनप्रतिनिधि जिनके इशारे पर यह सब खेल हुआ है वह भी बराबर के सहभागी हैं साथ ही तत्कालीन कलेक्टर और सीईओ को भी जांच के दायरे में लिया जाना चाहिए क्योंकि कोई भी दस्तावेज बगैर उच्चाधिकारियों के पास नहीं होते इसलिए सिर्फ लिपिक पर ही कार्यवाही अनुचित है कोरम पूर्ति अत्यंत हास्यास्पद लगती है हालांकि अभी आयुक्त के यहां जांच लंबित है लेकिन आयुक्त कलेक्टर और सीईओ सभी एक ही दूल्हे के बाराती हैं इसलिए किसी पर भी कार्यवाही होने की संभावना बहुत कम है संबंधित मामले की उच्च एजेंसी से जांच कराई जानी चाहिए क्योंकि मामले में लिपिक उच्च अधिकारी जिला पंचायत अध्यक्ष उपाध्यक्ष सहित अन्य जनप्रतिनिधियों की भी संलिप्तता है। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं वर्तमान में जिला पंचायत सांसद विधायकों का चारागाह बन गया है जहां से राशि बंदरबांट की जाती है और फिर कुर्सी के नीचे से सत्ता के रहनुमाओं को पहुंचाया जाता है यह बात भी सही है कि आम गरीब अगर काम रुक जाए तो जिला पंचायत में पदस्थ लिपिक कलेक्टर और सीईओ से बड़े हो जाते हैं वर्तमान में जिला पंचायत में पदस्थ लिपिकों की अगर संपत्ति की जांच कराई जाए तो एक राजपत्रित अधिकारी से ज्यादा होगी

【3】 *क्या अहम के टकराव में बिखर रहे संगठन या फिर बेलगाम लोगों के हाँथ में है संगठन की लगाम*?

इन दिनों संगठन में फेरबदल चल रहा है। क्योंकि इसी वर्ष मध्यप्रदेश में आम चुनाव होने हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में नए पदाधिकारी नियुक्त किये जा रहे हैं। यह प्रदेश के दोनों राजनीतिक दलों में जारी है। बात दोनों दलों की करें तो एक सत्ता में 15 सालों से काबिज है तो दूसरी सत्ता से 15 वर्ष से बाहर असंतोष दोनों में है क्योंकि कुछ दिनों पहले मुख्यविपक्षी दल में फेरबदल हुआ तो कुछ ज्यादा हायतौबा इसलिए नहीं हुआ क्योंकि एक हाँथ से अतिकारीबी दूसरे हाँथ में संगठन अंतरित हो गया वहीं सत्ता में काबिज संगठन के जिलाध्यक्ष में बदलाव हुआ तो मानों पहाड़ टूट पड़ा हो अपने ही संगठन को चुनौती भी दे डाले यह एक संगठक के सब्द नहीं हो सकते यह अहम प्रदर्शित करता है। जो राजनीति का ध्रुवीकरण करे वह संगठन का नहीं हो सकता दूसरी तरफ 15 वर्ष से सत्ता से बाहर मुख्यविपक्षी दल का संगठन भी अहम के टकराव में असंगठित है। वहां की यूवा विंग में ऐसा टकराव है मानों सीएम की कुर्शी खिसकने वाली हो यह संगठन को संगठित करने का वर्तमान लोकतंत्र है जो संगठन के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। आज इतना ही मुलाकात होगी अगले रविवार को

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