सीधी जिले की चिट्ठी आर .बी .सिंह ‘राज’ की कलम से

सीधी जिले की चिट्ठी आर .बी .सिंह ‘राज’ की कलम से

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*बड़े ‘ ताज ‘ की तमन्ना में…*
*दिल-ए-‘ बेकरार ‘ है ?*
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*प्यारे दोस्तों…!*

मध्य प्रदेश सीधी जिला स्वतंत्र इंडिया लाइव 7 तेजी से बदलते राजनैतिक घटनाक्रमों और अगले हफ्ते तक में लगने वाली चुनावी आदर्श आचार-संहिता की गर्माहट के बीच आज आपसे चर्चा की शुरूआत *मैं अपने इस ताजे स्वरचित शेर से करूं* तो ज्यादा प्रासंगिक होगा-

*अब हाजिर-मुकाम बौना सा लगे,*
*अहम के फरेब में …!*

*बड़े ‘ताज’ की तमन्ना में,*
*दिल-ए-बेकरार है …!!*
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*मित्रों…!*

*आज मैंने एक शब्द के कई भाषाओं में नाम पर एक सेल्फ रिसर्च तैयार किया है।*

*अंग्रेजी* में एक शब्द है *”पैसन”* जो अमूमन आज का युवा वर्ग अक्सर बड़े चाव से प्रयोग में लाता है और इसे एक पाजिटिव-वर्ड के रूप में लिया जाता है। *अरबी भाषा* में इसी *’पैसन’* को *’जुनून’* के नाम पर प्रयोग किया जाता है जबकि *हिंदी शब्दकोश* में इसी शब्द को *”दबी हुई इच्छा”* या फिर एक बदनाम हो चुके हिंदी शब्द *”वासना”* के नाम से जाना जाता है।
सभी भाषाओं में इस शब्द के नाम भले अलग हों,उन शब्दों के प्रति लोगों का नजरिया बदल जाता हो पर अर्थ सभी का एक ही है।
आज बात हम राजनीति की कर रहे हैं अत: हम हिंदी के भाषा के शब्द *”वासना”* का प्रयोग करें तो हर एक इंसान किसी ना किसी *वासना* से ग्रस्त होता ही है।
*इन वासनाओं के भी अनंत प्रकार हैं मसलन कोई नाम-वासना का शिकार है,तो कोई धन-वासना का,*
*कोई आत्म-प्रवंचना-वासना का तो कोई तारीफ-श्रवण-वासना का,*
*कोई सौंदर्य-वासना का तो कोई परनिंदा-वासना का,*
*कोई निड़र-वासना का शिकार है, तो कोई डर-वासना का,*
*कोई अहम-वासना का शिकार है, तो कोई इस शब्द को बदनाम कर देने वाली काम-वासना का…!*

कुल जमा वासनाएं अनंत और सभी के भीतर किसी न किसी रूप में होती ही हैं। जो कभी भी तृप्त नहीं होतीं। ये हर पल अपनी प्यास को बढ़ाती ही चली जाती हैं। एक मंजिल हॉसिल होते ही अगली बड़ी मंजिल की वासना की प्यास को तृप्त करने के लिए उस वासना से ग्रस्त सख्श को बेताब रखती हैं।

आज हमारी चर्चा का फोकस राजनीति है जहां इन वासनाओं के स्वरूप में सर्वाधिक चर्चित रहने वाली वासनाएं रही हैं-
*नाम (पद)-वासना, फिर परनिंदा-वासना फिर अहम-वासना।*
अमूमन राजनीति की दुनिया में यही होता रहा है लोग नाम कमाने के साथ परनिंदा में मशगूल रहते हैं और फिर उनकी अहम-वासना उन्हें हदों की हदें पार करने को प्रेरित व अतृप्त बनाए रखती हैं।
चलिए वाकिफ होते हैं एैसे ही कुछ नजारों से …!

*कयास हैं आधार…*
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*इस मुद्दे पर चर्चा की शुरूआत में ही हम ये साफ करना चाहते हैं कि हमारे विश्वस्त सूत्रों से प्राप्त अब तक की ताजी जानकारी के आधार पर हमने ये रिपोर्ट कयासों व संभावनाओं के आधार पर आपके लिए तैयार की है। भावी बदलने वाले घटनाक्रम में एैसे ही समीकरण एवं टिकट वितरण के परिणाम सामने आएगें इसकी हम पुष्टि नहीं करते।*

*उल्टी गिनती अब जल्दी ही…*
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कल से प्रारंभ हो रहे अगले माह अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में ही म.प्र. के प्रस्तावित विधानसभा चुनावों की आदर्श आचार-संहिता का लगना लगभग तय है जिससे मतदान के दिनों की उल्टी गिनती प्रारंभ हो जाएगी और इस आचार संहिता के लगने के साथ ही साथ यहां सभी दलों के लिए चुनावी तिथि की घोषणा उपरांत अपने-अपने प्रत्याशियों की विधानसभावार घोषणाओं की मारामारी प्रारंभ हो जाएगी। एैसे में अब प्रदेश के दोनों प्रमुख दल भाजपा व कांग्रेस में टिकटों को लेकर पार्टी के भीतर गंभीर राय-शुमारी एवं घमासान अब आखिरी दौर पर पहुंच रहा है।
वर्तमान की सरगर्मियों पर नजर दौड़ाएं तो कांग्रेस की वजाए भाजपा के भीतर की अब तक की प्राप्त कयासों की खबरें कहीं ज्यादा सरगर्म हैं। क्यूंकि भाजपा की तीन पंचवर्षीय से प्रदेश में सरकार है और वो चौथी बार भी सरकार बनाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाते हुए कोई रिस्क नहीं लेना चाहेगी जिससे आधी हकीकत-आधा फसाना की खबरें भाजपा में ज्यादा सुर्खियां बनती हैं।

*क्या सांसद अब हैं विधायक बनने को बेताब…?*
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इन दिनों राजनीति की दुनिया में हवा में तैरती कयासों भरी कुछ खबरों ने भाजपा के भीतर माहौल को जरा गर्म कर रखा है।
*बात निकली है जिले से दोनों भाजपा सांसदों यानी एक लोकसभा क्षेत्र सांसद एवं एक राज्यसभा सांसद के विधानसभा के चुनावी मैदान में उतरने की।*
सीधी जिले में चार विधानसभा की सीटें हैं जिसमें तीन सामान्य एवं एक आरक्षित है। वर्तमान में आरक्षित सीट पर तो भाजपा का ही कब्जा है पर तीन सामान्य सीटों में से सिर्फ एक पर ही भाजपा का कब्जा है जबकि दो सामान्य सीटों पर कांग्रेस का कब्जा है और भाजपा इस मर्तबा अपनी पुरानी दो सीटों को बचाने के साथ-साथ कांग्रेस की कब्जे वाली शेष दो सामान्य सीटों पर भी कब्जा करने को बेताब है। जिससे वो कुछ नए प्रयोग को यहां अपने चुनावी हथियार के रूप में आजमा सकती है।
और इसी प्रयोग की खबरों के साथ इस कयास का बाजार गर्म है कि भाजपा अपने दोनों सांसदों को विधानसभा में एक वजनदार प्रत्याशी बतौर मैदान में उतार सकती है।

*चुरहट सीट पर नजर…*
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भाजपा के भीतर के सूत्रों के कयासों के मुताबिक पार्टी के भीतर इन दिनों चुरहट से चुनाव मैदान में वर्तमान कांग्रेस विधायक व नेता प्रतिपक्ष के खिलाफ भाजपा अपने राज्यसभा सांसद को चुनाव मैदान में उतारने पर विचार मंथन कर रही है। संभवतह: इसी रणनीति के मद्देनजर वर्ष 2008 में चुरहट से भाजपा प्रत्याशी रह चुके पार्टी के प्रदेश महामंत्री को हालिया-अतीत में ही राज्यसभा सांसद बनाकर उनका कद बढ़ाया गया था जिससे भाजपा चुरहट में कांग्रेस के दिग्गज नेता के गढ़ को बराबर की टक्कर का प्रत्याशी देने की कोशिश के साथ फतह हासिल कर सके।

अतीत में वर्ष 2008 के विधानसभा चुनावों पर उस वक्त के समीकरण पर यदि नजर डालें तो तब जबकि गोड़वाना गणतंत्र पार्टी को चुरहट में 17 हजार मत मिले थे उस स्थिति में ही भाजपा के वर्तमान राज्यसभा सांसद ने बतौर भाजपा प्रत्याशी कांग्रेस को टक्कर देते हुए लगभग 35 हजार मत हासिल किये थे जबकि कांग्रेस लगभग 44 हजार मत पाकर विजयी हुई थी।
वर्ष 2008 का ये एक एैसा चुनाव था जिसमें कांग्रेस को प्राप्त कुल वोटों से अधिक वोटों की संख्या दो विपक्षी उम्मीदवार के मतों के योग्य की थी। उस वक्त कांग्रेस लगभग 9 हजार मतों से जीती थी।
जबकि वर्ष 2013 में जब 2008 के गोड़वाना गणतंत्र पार्टी के उम्मीदवार रहे चेहरे को भाजपा ने अपना प्रत्याशी बनाया तो भाजपा को प्राप्त लगभग 52 हजार के मतों के विरूद्ध कांग्रेस ने लगभग 71 हजार मत हासिल कर लगभग 19 हजार की बड़ी लीड से चुनाव जीता था।

*जातीय समीकरण साधने पर नजर…*
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*वर्ष 2008 के समीकरण पर भाजपा में एक्सरसाइज के कयास ये संकेत दे रहे हैं कि भाजपा चुरहट की राजपूत सीट माने जाने वाली इस विधानसभा में राजपूत की काट राजपूत से जोड़कर विचार मंथन कर रही है।*
*साथ ही हाल ही के एट्रोसिटी एक्ट एवं प्रमोशन में आरक्षण के मुद्दे पर सवर्णों की नाराजगी पर अतीत में कई पंचवर्षीय से जिस राजपूत वोट बैंक को सीधी जिले की सभी सामान्य सीटों पर भाजपा ने टिकट न देकर हासियें में रखा था उसे भी यहां चुरहट में टिकट देकर अन्य सीटों सहित राजपूत वोट बैंक को साधने की कोशिश की जा सकती है।*

*सीधी सीट पर नजर…*
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भाजपा के भीतर के सूत्रों के कयासों के मुताबिक चूंकि सीधी विधानसभा सीट पर लगातार दो बार से भाजपा का ही कब्जा है और पार्टी के लगातार सर्वे एवं सूत्रों के मुताबिक जिन सीटों पर भाजपा पिछली बार 5 हजार मतों से कम से हारी थी उसमें उसकी खास समीक्षात्मक नजर है।
चूंकि सीधी सीट भाजपा ने वर्ष 2013 में लगभग 23 सौ मतों से ही जीती थी इस फैक्टर के साथ प्रदेश की भाजपा सरकार की एंटी-एनकम्बेंसी के फैक्टर को जोड़कर भाजपा सीधी सीट पर अपनी जीत पक्की करने के लिए सीधी लोकसभा क्षेत्र सांसद व लगातार बतौर ब्राम्हण चेहरे को यहां मैदान में उतार सकती है।
जहां सीधी सीट पर बतौर विधानसभा प्रत्याशी भाजपा के नए चेहरे को वो एंटी-एनकंबेंसी के दौर के बीच लगातार जीत में तब्दील कर सके।

*सिहावल विधानसभा पर नजर…*
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पिछली मर्तबा 2013 में सिहावल विधानसभा में भाजपा बेहद बुरी तरह तकरीवन 32 हजार से अधिक मतों से चुनाव हारी थी। अब यदि भाजपा के सर्वे रिपोर्ट एवं 5 हजार से अधिक मतों से हारी सीट पर प्रत्याशियों के चयन की बात के मद्देनजर देखा जाए तो भाजपा यहां वर्तमान के अपने पार्टी के सीधी विधायक को एक नए चेहरे के बतौर सिहावल क्षेत्र के तकरीवन 45 हजार से अधिक ब्राम्हण मतदाताओं के क्षेत्र में मैदान में उतारकर कांग्रेस के मजबूत बन चुके गढ़ में फतह हासिल कर सकती है। एैसे में भाजपा एक साथ कई समीकरणों को बैलेंस भी कर सकती है।
जिसमें वर्तमान सीधी विधायक की सीट बदलकर भाजपा अपनी तथा अपने विधायक की स्वाभाविक एंटी-एनकंबेंसी से उबर सकती है वहीं कांग्रेस के सिहावल विधायक के बड़े राजनैतिक घराने को बड़े ब्राम्हण वोट बैंक के साथ अपने एक विधायक चेहरे के सहारे जीत हासिल कर सकती है।

*एंटी-एनकंबेंसी साधने का प्रयास…*
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इस सारी कयास भरी कवायत के पीछे एक रोचक तथ्य ये भी है कि भाजपा हर हाल में अपनी सरकार की तथा अपने विधायक व सांसदों की क्षेत्रीय एंटी-एनकम्बेंसी का आंकलन करते हुए कोई भी रिस्क लेती नहीं दिखती।
मसलन जो कयास हैं उसके मुताबिक सिहावल विधानसभा सीट तो सीधी लोकसभा क्षेत्र सांसद का गृह ग्राम है परन्तु उन्हें अपने लोकसभा के पिछले निर्वाचन में संसदीय क्षेत्र की 8 में से जिन दो विधानसभा सीटों पर हार की लीड़ मिली थी उसमें ब्यौहारी के साथ-साथ उनकी गृह विधानसभा सिहावल भी थी जिसमें तकरीवन 10 हजार मतों की बढ़त कांग्रेस के इसी विधानसभा से तब के लोकसभा प्रत्याशी को मिली थी।
और चूंकि वर्तमान में कांग्रेस के सिहावल विधायक उसी परिवार से वास्ता रखते हुए फिर मैदान में होंगे जिससे भाजपा यहां अपने सांसद को मैदान में न उतारकर एवं उनके प्रति अब तक के एंटी-एनकंबेेंसी फैक्टर से बचाव करते हुए सीधी सीट पर अपनी जीत का दांव खेलना चाहती है।

*मंत्री पद के ख्वाब…*
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भाजपा के भीतर के इन कयासों भरी सुर्खियों के साथ एक सुर्खी ये भी है कि भाजपा जहां अपनी चौथी बार सरकार बनाए रखने के लिए सारे नए प्रयोग करने के रास्ते खोलकर रख रही है वहीं *सीधी जिले से दोनों सांसद यानी लोकसभा एवं राज्यसभा सांसद खेमों को इसमें भी एक हसीन ख्वाब दिखने लगा है। वो हसीन ख्वाब है उनकी भावी संभावित जीत एवं चौथी बार भाजपा की प्रदेश में सरकार बनने पर अपनी-अपनी वरिष्ठता व पार्टी में मजबूत पकड़ के दावे के साथ सरकार में मंत्री बनने का।*
क्यूंकि मंत्री बनने का जो जलवा जुलूस है वो ग्लैमर सांसद बनने से कहीं ज्यादा है।
*हालांकि इसके साथ का एक दूसरा घातक पहलू भी इन सांसदों के लिए चुनौतीपूर्ण साबित होगा कि एैसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में वो यदि विधानसभा चुनाव हार जाते हैं तो उनके पास सियासत तो बची रहेगी पर उनके रसूख पर बड़ा बट्टा लगेगा।*

*और अंत में…*
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*कुल जमा यदि कहा जाए तो राजनीति की जो वासना है- नाम (पद)-वासना और अहम-वासना वो इस सियासत में वरिष्ठता के साथ-साथ इतनी अतृप्त होती जाती है कि-जो भी अब तक हाजिर-मुकाम होता है वो भी बढ़ते अहम-वासना के साथ बौना लगने लगता है। और परिणाम ये होता है कि एक ताज हासिल होते ही अगले बड़े ताज यानी पद-वासना की तमन्ना में दिल-ए-बेकरार ही रहा आता है।*

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