*हम तो पूँछेंगे कलम की धार से रोहित मिश्रा*

*हम तो पूँछेंगे कलम की धार से रोहित मिश्रा*

【1】 *क्या सीधी जिले की चार शीट सहित विन्ध्य में खुद को साबित कर पायेगी कांग्रेस*?

【2】 *क्या सीधी विधानसभा में सत्ता परिवर्तन या स्थायित्व में निर्दलीय और छोटे दलों का रहेगा अहम किरदार या फीका रहेगा करिश्मा*

【3】 *क्या चुनाव के समय विलुप्तप्राय प्राणियों के दावों और हकीकत पर किया जा सकता है विस्वाश ? कैसा रहेगा लोकतंत्र के परीक्षा का परिणाम*?

मध्य प्रदेश जिला सीधी हमारी विशेष पेशकश हम तो पूछेंगे कलम की धार से लोकतंत्र के महाकुंभ में व्यस्तता के कारण कुछ समय नहीं लिखा जा सका अब मतदान खत्म हो गया है और आज रविवार के बजाय सोमवार है फिर भी विशेष पेशकश के जरिए हम पूछ रहे हैं कुछ सवाल। लेकिन लोकतांत्रिक प्रणाली में मंदिर के सबसे बड़े पुजारी सीधी जिले के सिहावल में जन्मे इंद्रजीत कुमार के दुखद निधन के बाद मेरी कलम पहली बार चल रही है वह शोषित,पीड़ित निर्धन,की आवाज बुलंद किया करते थे उनके निधन के बाद जिले में राजनीतिक शून्यता बढ़ी है। उन्हें याद करते हुए हम आंखों से नमन
*अब सवाल*
लोकतंत्र के महाकुंभ का समापन हो चुका है और इस मेले में सभी आ कर चले भी गए हैं लेकिन इसी बीच कुछ सवाल मन में कौतूहल कर रहे हैं कि क्या सीधी जिले के चारो सीट सहित विंध्य में खुद को साबित कर पाएगी कांग्रेस ऐसा इसलिए पूँछ रहे हैं क्योंकि मध्यप्रदेश में बीते 15 साल से बीजेपी की सरकार थी और सरकार के विरुद्ध जबरदस्त आक्रोश था सवाल तो सवाल ही होता है चले बात कर लेते हैं सीधी विधानसभा की यह सीट बीते 10 साल से सत्ता के साथ थी यहां कुछ वर्षों से विकास के नाम पर चुनाव नहीं लड़े जाते यहां जातीय विभेद सुरक्षा य अन्य विषैले मुद्दों पर जनता को जबरदस्त तरीके से उलझाया जाता है चुनाव के 2 दिन पहले विष के प्याले पिलाए जाते हैं लेकिन इस बार सीधी चौकन्ना रही और हर ऐसे जातीय ध्रुवीकरण के कार्ड को नकार दी जो सीधी के हित में नहीं था हालांकि ऐसा नहीं है कि कार्ड खेलने का प्रयास नहीं किया गया कार्ड खूब खेला गया लेकिन वह जन चर्चा में तब्दील नहीं हो पाया बल्कि नकारात्मक चर्चाएं शुरू हो गई वहीं दूसरी ओर मुख्य विपक्षी दल ने पहली बार बड़ा सदा हुआ चुनाव लड़ा किसी तरह कोई कमी जनता की नजर में नहीं दिखाई दी जिन को मुद्दा बनाकर बस चुनाव मैदान में होते थे वह मुद्दा ही खत्म कर दिया गया जिस फैसले का शहर के व्यवसायियों ने खूब समर्थन किया और लोकतांत्रिक महाकुंभ में डुबकी लगाई ऐसा पहली बार स्पष्ट लग रहा है कि सीधी विधानसभा ने बदलाव की स्टेरिंग मोड़ दिया वहीं चुरहट में सत्तासीन दल ने संगठन के सबसे बड़े नेता का चुनावी जनसभा कराया प्रदेश के मुखिया ने भी चुरहट की गलियों में घूमा पर कुछ अनुपात को छोड़ कर सीट अपरिवर्तित रहने की पूर्ण उम्मीद है हालांकि जीत का मत प्रतिशत जरूर घटेगा सिहावल में सत्ता के उम्मीदवार की बहुत बुरी हालत है वहां बागियों ने बीजेपी को तीसरे नंबर में धकेलने का पूर्ण प्रयास किया है और ऐसा होता दिख भी रहा है वहां सीट पूरी तरह अपरिवर्तित है जीत का आंकड़ा जिले में सर्वाधिक हो सकता है सबसे संशय पूर्ण विधानसभा जिले की आरक्षित सीट धौहनी थी जहां चुनाव के 7 दिन पहले तक बीजेपी की स्थिति बहुत शानदार थी और वहां से कुंवर सिंह टेकाम चौथी बार विधायक बनते नजर आ रहे थे लेकिन चुनाव के 1 हफ्ते पूर्व स्थिति धीरे धीरे बदलने लगी और बाद में स्पष्ट बदलाव की ओर कुसमी मझौली सहित कई आदिवासी अंचल के लोग चले हैं हमारे दावे कितने हकीकत है कितने नहीं यह तो 11 दिसंबर को ही पता चल पाएगा लेकिन अनुमानों के आईने में हम यह स्पष्ट तरीके से कह सकते हैं कि विंध्य में पूर्व के विधानसभा चुनाव के मुकाबले प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी की हालत बेहतर है जनता के फैसले का इंतजार है

【2】 *क्या सीधी विधानसभा में सत्ता परिवर्तन या स्थायित्व में निर्दलीय और छोटे दलों का रहेगा अहम किरदार या फीका रहेगा करिश्मा*?

मतगणना 11 दिसंबर को है सीधी विधानसभा का ताज किसके सिर बंधेगा यह तो वक्त ही बताएगा लेकिन जिस तरह जन चर्चाएं सुर्खियां बटोर रही है उससे सवाल जरूर पैदा हो जाता है कि सीधी विधानसभा में परिवर्तन की बयार जिस तरह चली है उसमें छोटे दलों के बागी उम्मीदवारों और निर्दलीय प्रत्याशियों का स्थायित्व या परिवर्तन में अहम किरदार रहने की उम्मीद है कुछ उम्मीदवार 5 से 7000 बोट इकट्ठा कर सकता के विधायक की नींद चैन उड़ा दिए ऐसा वह स्वयं नहीं किए बल्कि एक कूटनीतिक चाल के तहत ऐसा किया गया क्योंकि अहम चाहे समाज में हो या राजनीति में अपच और घातक होता है इसलिए सीधी विधानसभा में अस्पष्ट हार जीत की उम्मीद और दावा नहीं किया जा सकता मतलब जीत का आंकड़ा 20 से 25000 रहने की उम्मीद नहीं है बल्कि किसी भी दल को जीत या हार 7 से 8000 रहने की उम्मीद है यह आंकड़ा और भी नीचे आ सकता है जिसमें निर्दलीय बागी और छोटे उम्मीदवारों का अहम किरदार है और यह कोई करिश्मा नहीं बल्कि सोची समझी रणनीति है

【3】 *क्या चुनाव के समय विलुप्तप्राय प्राणियों के दावों और हकीकत पर किया जा सकता है विस्वाश? कैसा रहेगा लोकतंत्र के परीक्षा का परिणाम*?
चुनाव खत्म हो गया है तो शहर के भीड़ भाड़ वाले इलाकों में गुणा गणित लगाया जाना शुरू हो गया है कोई किसी को जीता रहा है तो कोई किसी को हरा रहा है यह वह लोग हैं जिनका किसी भी दल के साथ स्पष्ट रूप से प्रचार का वास्ता नहीं रहा और कुछ ऐसे भी लोग हैं जो दल के साथ रहे लेकिन प्रचार-प्रसार करने घरों से नहीं निकले और निकले भी तो पूरे मन से किसी के लिए वोट मांगते नजर नहीं आए लेकिन जो सरगर्मी चुनाव के समय झगड़े में तब्दील होती नजर आ रही थी वह स्थिति इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में कैद मतों के बाहर लोगों के बीच जीत हार को लेकर मनमुटाव की स्थितियां पैदा हो रही हैं जबकि राजनैतिक प्रचार प्रसार सत्ता परिवर्तन या स्थायित्व के एक निश्चित समय के बाद सामाजिक परिवेश में मनुष्य को सामाजिक प्राणी के संपूर्ण धर्म का निर्वहन करना चाहिए आपस में हम सभी समाज के एक पिलर हैं और चुनावी मनमुटाव को दुश्मनी में तब्दील होने से बचाने का भरसक प्रयास करना चाहिए इस तरह ऐसे लोगों के आंकड़ों दावों और हकीकत पर विस्वाश नहीं किया जा सकता वास्तविक स्थितियां मशीन में कैद हैं कुछ विधानसभा को छोड़कर कोई प्रत्याशी भी जीत हार का पूर्ण अनुमान इस विधानसभा में नहीं बता सकता आज बस इतना ही मिलेंगे अगले रविवार को कुछ और सवालों और सरकार बनने बिगड़ने की समीक्षा के साथ

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