*हम तो पूँछेंगे कलम की धार से*

*हम तो पूँछेंगे कलम की धार से*

【 1】 *क्या जिला अधिवक्ता संघ में हुई सिद्धांतों की जीत*?

【2】 *क्या रामपुर नैकिन के पूर्व नगर निरीक्षक के अलावा भी कुछ पुलिसकर्मियों पर होनी चहिये कार्यवाही*?

【3】 *क्या जिले की राजनीति में बढ़ रही जातीय दूरियां*?

सीधी:- हम प्रत्येक रविवार को अपने लेखनी के जरिये सवालों के माध्यम से समाज और जनसमुदाय से जुड़े मुद्दों को खगालने और परोसने का काम करते हैं आज पहला सवाल पूंछ रहे हैं जिलाधिवक्ता संघ सीधी के आज आये परिणाम पर सवाल ये की- *क्या जिला अधिवक्ता संघ में हुई सिद्धांतो की जीत* संघ का निर्वाचन प्रत्येक दो वर्ष के लिए होता है जिसमे अध्यक्ष समेत 4 अन्य पदों का निर्वाचन किया जाता है। सीधी अधिवक्ता संघ में 4 बार से लगातार निर्वाचित होकर मुनींद्र द्विवेदी संघ के अध्यक्ष थे आज आये परिणाम में संघ के नए अध्यक्ष के रूप में बृजेन्द्र सिंह को सफलता प्राप्त हुई उन्होंने कड़े मुकाबले के बीच अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी मुनींद्र द्विवेदी को 11 मतों से पराजित कर दिया। अब सवालों के बीच प्रश्न यह कि क्या संघ में सिद्धांतो की जीत हुई। इसमे यह स्पस्ट करने योग्य है कि पूर्व में सीधी के संघर्षशील ब्यक्ति उमेश तिवारी भी चुनावी मैदान में इस शर्त पर थे कि एक बार उन्हें भी निर्विरोध चुन लिया जाय जिसके लिए अधिवक्ताओं की सदन में मीटिंग भी बुलाई और सभी प्रत्याशियों को सदन में अपनी बात रखने के लिए आमंत्रित भी किया लेकिन बृजेन्द्र सिंह के शिवाय कोई अन्य उम्मीदवार सदन में उपस्थित नहीं हुए जबकि सदन चर्चा के लिए होता है वहां अपनी बेबाक राय रखनी चाहिए थी जिससे अतिप्रबुद्ध माने जाने वाले अधिवक्ताओं के बीच साख प्रदर्शित हो सकती लेकिन अध्यक्ष सदन से नादारद रहे अगर वह उपस्थिति होते अपनी बात रखते तो ऐसी स्थिति न आती दूसरी ओर वर्तमान में निर्वाचित संघ के नए अध्यक्ष ने बड़ी सालीनता से उमेश तिवारी के निर्विरोध अध्यक्ष बनाये जाने का समर्थन किया लेकिन दो अन्य प्रत्याशियों के सदन में अनुपस्थित के कारण निर्विरोध का प्रस्ताव पारित नहीं हो सका और श्री तिवारी के पर्चा वापस लेते ही मुकाबला त्रिकोणीय हुआ जिसमें राकेश चतुर्वेदी ने संघ चार बार के अध्यक्ष के बोट पर जमकर सेंध लगाया और बृजेन्द्र सिंह संघ के अध्यक्ष बन गए एक बात और रही कि नवनिर्वाचित संघ के अध्यक्ष ने सीनियर और जूनियर सभी के साथ समान भाव से भेंट किया और परिवर्तन की ओर कदम के नाम पर वोट मांगा बात जैसी हो लेकिन तकनीकी और अडिगता के कारण पराजित हुए मुनींद्र द्वीवेदी।
*क्या रामपुर नैकिन के पूर्व नगर निरीक्षक के अलावा भी कुछ पुलिसकर्मियों पर होनी चाहिए कार्यवाही*?
रेत माफिया पर कार्यवाही के नाम पर सीधी जिले के रामपुर नैकिन उपखंड के उपखंड अधिकारी और नगरनिरीक्षक के बीच रेत तस्करों पर कार्यवाही के नाम पर जमकर बयानवाजी और हवावाजी हुई जिसमें जिले के पुलिस अधीक्षक भी पुलिस का बचाव करते नजर आए पुलिस अधीक्षक अपने बड़े साफगोई से इस बात को इंकार कर दे की पूर्व नगर निरीक्षक पुष्पेंद्र मिश्रा किसी तरह के दोषी हैं लेकिन हाल ही में पुलिसकर्मियों के फोन से रिकॉर्ड किए गए ऑडियो ने यह साबित कर दिया कि पुष्पेंद्र मिश्रा नगर निरीक्षक कहीं ना कहीं चूक जरूर किये यह बात भी स्पष्ट कर देना जरूरी है कि पुलिस की बात आम जनमानस तक ऑडियो टेप के माध्यम से पहुंचना वह भी पुलिसकर्मी के माध्यम से सिविल सेवा नियम का उल्लंघन है अगर ऐसी बात पुलिसकर्मियों के माध्यम से नगर निरीक्षक द्वारा की जा रही थी तो निश्चित तौर पर निंदनीय है और ऐसे में पुलिस अधीक्षक द्वारा नगर निरीक्षक का बचाव करना भी सवालों के घेरे में है इससे बड़ा सवाल यह है कि पुलिस के दो अन्य कर्मचारी जो ऑडियो में नवीन और सुभाष के नाम से वायरल हो रहा है वह दोनों पुलिसकर्मी ही है जिसमें एक आरक्षक और एक नगर सैनिक है सवाल यह कि नगर निरीक्षक द्वारा इन पुलिसकर्मियों के माध्यम से रेत तस्करों की मदद के संबंध में ऐसी बातें क्यों की जा रही थी और अगर की जा रही थी तो वैधानिक प्रश्न यह उठता है कि पुलिस कर्मियों के विरुद्ध कार्यवाही सिविल सेवा नियम के तहत क्यों नहीं की जा रही है क्या अपने ही अधिकारी की बात को जन समुदाय में वायरल करना अपराध का सृजन नहीं करता और अगर करता है तो अब तक कार्यवाही क्यों नहीं की गई दूसरी ओर रेत के नाम पर नायक बनने चले उपखंड अधिकारी चुरहट की संबंधित मामले में जमकर किरकिरी हुई क्योंकि उपखंड अधिकारी चुरहट ने अपने कर्तव्यों का संजीदगी से पालन नहीं किया और असफलता को पुलिस पर मढ़ते नजर आए।
*क्या जिले की राजनीति में बढ़ रही जातीय दूरियां*?
सीधी राजनीति की दृष्टि से मध्यप्रदेश में एक चमकता हुआ जिला है यहां से दिल्ली तक महत्वपूर्ण पदों में रहने वाले राजनीतिज्ञ पैदा हुए और देश मे सीधी का सिक्का भी स्थापित किये लेकिन उस दौरान कभी भी जातीय उन्माद पैदा नहीं हुआ हालांकि जातिवाद धर्मवाद लोगों की मानसिकता में हमेशा से रहा पर वह कभी समाज में विष घोलने का काम नहीं किया वर्तमान राजनीति की अगर बात की जाए तो जातीय दूरियां इस कदर बढ़ गई हैं कि एक जाति विशेष को किसी भी महत्वपूर्ण पद चाहे वह राजनीतिक हो या प्रशासनिक में देखना नहीं चाहता अगर जिले की राजनीति की बात करें तो सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों में जातिवाद का विष बुरी तरह से घुला हुआ है जिस कारण से मानवतावादी सिद्धांत लोगों के जहन से उतरता जा रहा है और लोग जाति और धर्म के नाम पर अपने लोगों से बिछड़ते जा रहे हैं बात का बतंगड़ इतना ज्यादा है कि कभी-कभी एक पक्ष से मिले बगैर भी दूसरी दूसरा पक्ष दूसरों की बात को सुनकर दूरियां बना लेता है बात करें वर्तमान में एससी एसटी एक्ट के बदलाव पर शुरू हुए आंदोलन की तो इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है की सामान्य के विरुद्ध जनजातीय लोगों का जबरदस्त गुस्सा है और उसी के उलट सामान्य लोगों का भी। लेकिन अगर राजनीति से परे इस बात को सोचा जाए तो माननीय उच्चतम न्यायालय ने सिर्फ इस बात को कहा कि किसी भी निर्दोष की जांच बगैर गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए लेकिन यह बात जनजाति आंदोलनकारियों के नेताओं ने उन्हें समझाने के बजाय उकसाने का प्रयास किये और शानदार भाईचारे को कटुता में तब्दील कर दिया लेकिन अगर जातीय दूरियों की बात करें तो सामान्य में भी कमजोरियां नहीं है सामान्य -सामान्य से। अनुसूचित जाति जनजाति OBC पिछड़ा और अन्य सभी एक दूसरे से घृणास्पद व्यवहार कर रहे हैं और ऐसे में राजनीतिक नेता अपनी वोट की राजनीति करते नजर आ रहे हैं। इस तरह जिले में ही नहीं अपितु पूरे देश प्रदेश के जातिवाद का टम्प रूपी कार्ड जमकर खेला जा रहा है। मिलेंगे कुछ और सवालों के साथ अगले रविवार को।

*एड.रोहित मिश्रा【जिला न्यायालय सीधी मध्यप्रदेश】*

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