*हम तो पूँछेंगे कलम की धार से- रोहित*

*हम तो पूँछेंगे कलम की धार से- रोहित*

【1】 *क्या वाकई मौत का सौदागर हो गया है अस्पताल प्रबंधन*?

【2】 *क्या कोतवाली पुलिस राजनीतिक हांथों तक सिमट कर रह गयी*?

【3】 *क्या इस बीज वितरण न करके छोटे किसानों को समस्या में धकेलने का प्रबंधकीय चूक कर रहा शासन प्रशासन*?

मध्य प्रदेश जिला सीधी आज शनिवार 20 जून है और हम पूछ रहे हैं अपने विशेष पेशकश के माध्यम से हम तो पूछेंगे कलम की धार से कतिपय कारणों से हम अपने पिछले अंक को आप सबके समक्ष नहीं परोस सके थे जिसका हमें खेद है आज पुनः आप सबके समक्ष कलम लेकर लिख रहे हैं जनसमस्या का सवाल और जवाब-
पहले सवाल में पूछ रहे हैं सीधी की एकमात्र बड़ी अस्पताल जिला चिकित्सालय के संबंध में जिला चिकित्सालय के सिविल सर्जन का तबादला हो गया वह भी चिकित्सालय को दीमक की तरह खा रहे थे उसके बाद ऐसा महसूस हुआ की इस फेरबदल से वाकई दूरदराज से आने वाले ग्रामीण आदिवासी भाइयों को बिना रोक तोक सुलभ चिकित्सकीय सुविधा प्राप्त हो सकेगी लेकिन नवीन सिविल सर्जन उनसे भी 3 गुना आगे पटरी पर चलते हुए अपना सासनी क्षमता दिखाना शुरू कर दिए हुआ यूं कि बीते दिनों एक प्रजापति के बेटी को खून की आवश्यकता खून की वजह से उसकी जान जा सकती थी और अंततः चली भी गयी इस बात की जानकारी स्वंय चिकित्सकों द्वारा उस बच्ची के परिजनों को दिया गया चिकित्सालय प्रबन्धन द्वारा नियम का हवाला देते हुए कहा गया कि ब्लड के बदले ब्लड दे दिया जाय तब शरीर मे ब्लड चढ़ाया जाएगा जिसकी जानकारी सीधी कलेक्टर को भी हुई कलेक्टर ने निर्देशित किया कि ब्लड मुहैया कराया जाय ब्लड की वजह से जान जाने से रोका जाए लेकिन हुआ उल्टा अस्पताल प्रबन्धन ने सीधी कलेक्टर के बात को दरकिनार करते हुए ब्लड देने से इंकार कर दिया अंततः उस बच्ची की जान चली गयी जबकि भगवती मानव कल्याण समिति ने बीते कुछ दिन पूर्व ही अस्पताल को खून दान किया था जिसका विधिवत प्रमाण पत्र दिखाया जा रहा था लेकिन नया ताम झाम वाला अस्पताल प्रबन्धन न तो कलेक्टर का सुना और न परिजन का बात आगे बढ़ी इसमें सीधी कलेक्टर को अवगत कराया गया जांच की बात हुई तो नई बात सामने आई कि ब्लड की वजह से जान नहीं गयी यह भी चौंकाने वाला सवाल था इसमे दो सवाल थे—1 -अगर ब्लड से जान नहीं गयी तो ब्लड की बात सार्वजनिक क्यों हुई?

2-और जब ब्लड की बात सीधी कलेक्टर से हुई तो चिकित्सको ने कलेक्टर को यह क्यों नहीं बताया कि बच्ची के शरीर मे पर्याप्त ब्लड है
3-बात हवा ले ली तो अस्पताल प्रबंधन ने प्रेस वार्ता करके यह क्यों नहीं बताया कि मौत की खबर अपवाह है सच्चाई यह है
इसके बाद भी कई सवाल अस्पताल प्रबंधन पर उठते हैं मौत तो आम हो चुकी है अतः आग्रह के साथ अस्पताल प्रबंधन किसी गरीब के स्वास्थ्य से खिलवाड़ न करे।

【2】 *क्या कोतवाली पुलिस राजनीतिक हांथों तक सिमट रही है*?

बीते कुछ दिनों से सत्ता में परिवर्तन हो गया और प्रशासन तुरंत बाद पलटी मारना शुरू कर दिया यह बात सही है कि प्रशासन अपना प्रशासनिक काम अपने तरीके से ही करेगा और करना भी चाहिए लेकिन जब मात्र पुलिस प्रशासन राजनीतिक विद्वेष में आकर अभियोजन करने लगे तो बात हजम नहीं होती अब देखिए न बीते दिनों मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री की एक वीडियो शोसल मीडिया में तैरने लगी जिस पर विपक्ष के एक नेता के ऊपर भोपाल पुलिस के क्राइम ब्रांच ने एफआईआर भी किया उस वीडियो प्रदेश के कई लोगों ने वायरल किया किसी भी ब्यक्ति के समक्ष जब कोई फोटो वीडियो आती है तो उस पर सद्भावनापूर्वक विचार करते हुए वायरल हो जाती है या कर दी जाती है कार्यवाही किस पर हो इसके लिए भोपाल में विशाल साइवर सेल की ब्यवस्था की आखिर किसने वीडियो को काट छांट किया है उस पर कार्यवाही हो ऐसे कई ऑडियो वीडिओ से शोसल मीडिया भरा पड़ा है राजनीतिक दल के आइटी सेल अपने दल के हिसाब से वीडियो में काट छांट करते रहते है लेकिन कभी एफआईआर नहीं होती एफआईआर हुई भी तो किस पर जिसने न तो वीडियो को काटा और न उसके मूल स्वरूप में परिवर्तन किया और न ही दुर्भावनापूर्वक फैलाने की कोशिश ही किया फिर भी धारा-500 ,501,और 505 (2) के तहत कार्यवाही हुई निसमे विधिक तथ्य यह है कि किसी भी मानहानिकारक विषय पर पुलिस को एफआईआर करने का अधिकार नहीं है मात्र परिवाद न्यायालय में संस्थित किया जा सकता है और लोकसेवक की स्थित में अनुमति लेकर परिवाद संस्थित किया जा सकेगा विधि द्वारा वर्जित विषयों पर पुलिस राजनीतिक कलम चला रही है जो अपच सा लगता है पुलिस को आशय दुराशय और विधिक विन्दुओं को जांचकर सम्पूर्ण कार्यवाही करना था खैर कलम अपनी कुर्शी सरकार की खिसके बचाना भी जरूरी था

【3】 *क्या इस वर्ष बीज बितरण न करके छोटे किसानों को समस्या में धकेलने का प्रबन्धकीय चूक कर रहा है शासन प्रशासन*?

देखते ही देखते एक वायरस ने पूरे सामाजिक जीवन को ही बदल कर रख दिया लोग आर्थिक तौर पर तंग और बदहाल हो गए ऐसा लगने लगा कि पहले वाली जिंदगी कभी वापस नहीं लौट पाएगी ऐसी स्थिति में लोग अपना काम धंधा छोड़कर अपने घर परिवार की ओर वापस लौट आए और जिसके पास जितनी भी भूमि थी उस पर खेती किसानी करने का मन बना लिया और यह पहली बार हो रहा है कि जिन लोगों ने कभी भी कृष का कार्य नहीं किया वह भी जीविकोपार्जन करने के लिए ऐसा करना उचित समझ रहे हैं ऐसे में लोगों के पास खाद बीज की समस्या होना लाजमी है हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी छोटे किसान यह आशा लगाए हुए थे कि सरकार द्वारा 3 किलो धान जो मिनी किट के रूप में दी जाती थी दी जाएगी लेकिन हाथ में पानी फिरता नजर आ रहा है इस वर्ष किसी भी किसान को मिनी किट का वितरण नहीं किया गया और ना ही 1 किलो उड़द और मक्के का ही वितरण किया गया ऐसे में आर्थिक बोझ झेल रहे किसान बदहाली की स्थिति में खेत में अनाज कैसे उगाएं यह सोचते हुए काफी तंग और परेशान हैं जबकि शासन और प्रशासन को सोचना चाहिए इस संबंध में विचार करते हुए कोरोना काल मे कृषकों को राहत दिया जाना था लेकिन ऐसा नहीं किया जा रहा है यह वाकई कृषकों के लिए निराशा का सबब है जिससे आम जनमानस का भी जीवन जुड़ा हुआ होता है आज बस इतना ही अगले शनिवार को कुछ सवालों के साथ अभिव्यक्ति की आजादी के साथ कलम हर हफ्ते सच-सच लिखती रहेगी

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